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Shri Datta Swami

 Posted on 22 Jun 2025. Share

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हिंदू धर्म का गहन अध्ययन

परम पूज्य श्री दत्त स्वामी ने कहा:-

हे भगवान के विद्वान और समर्पित सेवकों !

१- हमें अपने हिंदू धर्म का गहराई से विश्लेषण करना चाहिए और अपनी गलतियों को सुधारना चाहिए। जब तक हम अपनी गलतियों को नहीं सुधारते, तब तक हमें दूसरों को सलाह देने का कोई अधिकार नहीं। हमें अपनी तिनके के समान दोष को भी विशाल पर्वत के समान देखना चाहिए और अपनी पर्वत जैसी अच्छाइयों को तिनके के समान देखना चाहिए। लेकिन, हर कोई इसका उल्टा कर रहा है। हर व्यक्ति अपनी तिनके के समान अच्छाई को पर्वत के समान बड़ा देखता है और अपनी पर्वत जैसे बड़े दोषों को केवल एक छोटे से तिनके के रूप में देखता है। जब तक व्यक्ति के इस स्वभाव में परिवर्तन नहीं होता, तब तक कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त नहीं कर सकता। हमें अन्य धर्मों की छोटी सी अच्छाई को भी पर्वत के समान बड़ा देखना चाहिए और उनके पर्वत जैसे विशाल दोषों को केवल छोटे से तिनके के समान देखना चाहिए। प्रत्येक धर्म और प्रत्येक व्यक्ति को इस सलाह का पालन करना चाहिए। तभी प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक धर्म पवित्र हो सकेगा और इस संसार में सदा के लिए शांति की स्थापना हो पाएगी।

२- हमें अन्य धर्मों की चिंता नहीं करनी चाहिए कि वे इस सलाह को मानते हैं या नहीं। हमें स्वयं इस सलाह का पालन करना चाहिए और अपने आप को शुद्ध और पवित्र करना चाहिए। यदि आप ये कहते हैं कि आपने स्वयं में पवित्रता या सुधार इसलिए नहीं लाया क्योंकि अन्य लोगों ने स्वयं में पवित्रता या सुधार नहीं लाया, तो भगवान कहेंगे कि ठीक है, फिर आपको भी दूसरों के साथ नरक में दंडित किया जाएगा ! अतः, पलायन का यह मार्ग व्यर्थ है और आप ऐसी बहानेबाजी से बिल्कुल भी बच नहीं सकते।

३- हमें अन्य धर्मों में दोष नहीं ढूंढना चाहिए। यदि हम अपने दोषों को ढूँढकर सुधारते हैं, तो अन्य लोग भी अपने दोषों को ढूँढकर स्वयं ही सुधारेंगे। यदि हम दूसरों में दोष ढूँढते हैं और स्वयं को नहीं सुधारते, तो वे भी हमारे दोष ढूंढेंगे और स्वयं को नहीं सुधारेंगे। इसका अर्थ यह है कि आप जो भी करेंगे, अन्य लोग भी वही दोहराएंगे। एकबार, एक टोपी बेचने वाला आदमी बहुत सारी टोपियों के साथ पेड़ के नीचे सो गया, जो उसे बेचनी थीं। जब वह टोपीवाला जागा, तो उसने पाया कि पेड़ पर बैठे कुछ बंदर नीचे आकर उसकी सारी टोपियाँ पेड़ पर उठा ले गए। हर एक बंदर ने एक टोपी पहनी हुई थी क्योंकि टोपी बेचने वाला भी टोपी पहने हुए था। टोपी बेचने वाले ने बहुत देर तक बंदरों से विनती की, लेकिन किसी बंदर ने उसकी बात नहीं मानी। फिर, टोपी बेचने वाले ने बहुत परेशान होकर अपनी टोपी उतारकर ज़मीन पर फेंक दी। तुरंत ही सभी बंदरों ने भी अपनी टोपियाँ ज़मीन पर फेंक दीं। बेचने वाले ने सारी टोपियाँ इकट्ठी कीं और वहाँ से चला गया। आपको इस कहानी से यह समझना चाहिए कि जिस कार्य की आशा आप दूसरों से रखते हैं, वैसा ही आपको स्वयं करना चाहिए ताकि दूसरे आपके कार्य की नकल कर सकें।

४- आपको शायद ऐसा लगे कि भले ही हम अपने दोषों का विश्लेषण करके उन्हें सुधार भी लें, पर शायद अन्य लोग ऐसा न करें। पर तब भी, इसमें हमारा लाभ ही होगा और दूसरों को हानि। जब हम अपने दोषों को सुधारते हैं, तो हमें भगवान की कृपा प्राप्त होती है। यदि अन्य लोग स्वयं को नहीं सुधारते, तो भगवान उन पर क्रोधित होंगे। इसलिए, सबसे अच्छी सलाह यही है कि हमें दूसरों के दोषों पर उंगली नहीं उठानी चाहिए और न ही उनके दोषों के लिए उन्हें डाँटना चाहिए, जब तक कि हम अपने दोषों को न सुधार लें।

५- आइए सच्चाई से हम अपने दोषों को पहचानें। आधी सफलता तो स्वयं समस्या की पहचान में ही कही जाती है क्योंकि यदि समस्या की सटीक पहचान हो गई, तो उसका समाधान आसानी से पाया जा सकता है और फिर उसे लागू करने पर समस्या हल हो जाती है। ऐसा विश्लेषण तभी सम्भव है जब हम अपने अहंकार को पूरी तरह समाप्त कर विचार करें। तभी दोष की पहचान और उसके बाद समाधान संभव है। यदि अहंकार वैसा ही बना रहा, तो कोई भी व्यक्ति अपने दोष को पहचान ही नहीं सकता है। अहंकार व्यक्ति को अपने दोषों को पहचानने और स्वीकार करने से रोकता है।

हिंदू धर्म के उप-धर्मों में आपसी भेद विश्व के धर्मों के आपसी भेद (व्यापक स्तर) का ही छोटा प्रतिरूप (लघु स्तर) है। इन आपसी भेदों और तनावों के कारण हिंदुओं में और विश्व के लोगों में एकता और शांति खंडित हुई है। शंकराचार्य ने हिंदू धर्म में शांति स्थापित करने के लिए, हिंदू धर्म के उप-धर्मों में एकता लाने का प्रयास किया। स्वामी विवेकानंद ने विश्व शांति के लिए, विश्व के धर्मों में एकता लाने का प्रयास किया। धर्मों और उप-धर्मों के बीच की एकता की कमी को दूर करने के लिए हमें पहचानना होगा कि एक ही अकल्पनीय परब्रह्म विश्व के विभिन्न धर्मों और उप-धर्मों में विभिन्न रूपों (वेशभूषाओं) में अवतरित हुए हैं। उन्होंने विभिन्न भाषाओं में, विभिन्न धर्मों के लिए, विभिन्न स्थानीय संस्कृतियों और रीति-रिवाजों के अनुसार शास्त्र रचे। बाहरी विविधताओं के बावजूद, भगवान ने सभी धर्मों और उप-धर्मों में आंतरिक एकता बनाए रखी है। सभी धर्मों और उप-धर्मों में समान रूप से: (१) भगवान की उपासना, (२) अच्छे कर्मों के लिए स्वर्ग और (३) बुरे कर्मों के लिए नरक, पाए जाते हैं।

यहाँ तक कि हिंदू धर्म में भी, यदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और मध्वाचार्य के भाष्यों का गहराई से अध्ययन किया जाए, तो उनमें भी मूलभूत एकता पाई जाती है। (इन तीन आचार्यों के तीन मतों के समन्वय, अर्थात त्रिमत समन्वय के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट पढ़ें :- www.universal-spirituality.org)

६- वेद कहतें हैं कि एक ही परब्रह्म तीन दिव्य कार्य करते हैं (सृष्टि का सृजन, पालन और संहार)। यदि आप भगवान दत्त को देखें, तो वे एक ही दिव्य मूर्ति हैं मगर उनके तीन मुख हैं—सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, पालनकर्ता विष्णु  और संहारकर्ता शिव। ये तीन मुख उनके तीन दिव्य कार्यों को दर्शाते हैं। तीन दिव्य कार्य करने वाले एक ही परब्रह्म की वेदोक्त परिभाषा भगवान दत्त के सिवा भगवान के किसी अन्य रूप में सार्थक नहीं होती। इसका अर्थ यह नहीं है कि भगवान के अन्य रूप दिव्य नहीं हैं। भगवान के अन्य रूप भी दिव्य ही हैं क्योंकि वे सभी भगवान दत्त के ही अवतार हैं। परब्रह्म या अकल्पनीय ब्रह्म, ब्रह्म का मूल स्वरूप हैं। परन्तु अकल्पनीय होने के कारण उन पर ध्यान नहीं किया जा सकता। जीवात्माओं के ध्यान-उपासना के लिए परब्रह्म ने ‘दत्त’ नमक एक दिव्य ऊर्जात्मक माध्यम (चैतन्य युक्त दिव्य शरीर) का निर्माण किया। उस दत्त-माध्यम का सृजन करने के बाद वे उसमें प्रवेश कर विलीन हो गए। विलीन होने के बाद दत्त, भगवान दत्त बन गए। भगवान दत्त, परब्रह्म के पहले ऊर्जात्मक अवतार या तेज-अवतार हैं। परब्रह्म और भगवान दत्त में तनिक भी अंतर नहीं है। परब्रह्म अदृश्य और अकल्पनीय हैं, जैसे कोई नग्न व्यक्ति स्नानघर में स्नान कर रहा हो। भगवान दत्त वही परब्रह्म हैं (नग्न व्यक्ति) जो तेज-रूपी (ऊर्जा-रूपी) माध्यम के वस्त्र पहने हुए हैं। यही भगवान दत्त अन्य धर्मों में ‘स्वर्ग के पिता’ कहलाते हैं। अतः प्रत्येक धर्म के भगवान (विविध अवतार) वास्तव में भगवान दत्त (स्वर्ग के पिता) के ही अवतार हैं। यह धारणा सार्वभौमिक धर्म या सार्वभौमिक अध्यात्म की नींव है। सार्वभौमिक अध्यात्म का यह उपदेश है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करना चाहिए और किसी भी धर्म के भगवान के रूप में दोष नहीं निकालना चाहिए। यदि कोई अन्य धर्म के भगवान के दिव्य रूप की निंदा करता है, तो वह अप्रत्यक्ष रूप से अपने ही धर्म के भगवान के दिव्य रूप की निंदा करता है।

७- हिंदू लोग, अपने जीवन में अध्यात्म की आवश्यकता को भूलकर सो रहे हैं। यह ज्वलंत समस्या है। इसका मूल कारण यह है कि हिंदू हमेशा सोचते हैं कि जीवात्मा बार‑बार जन्म लेती है, मरती है और फिर माँ के गर्भ में प्रवेश करके पुनर्जन्म लेती है (पुनरपि जननं, पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम् – आदि शंकराचार्य)। लोग ऐसा सोचते हैं कि जीवात्मा बार‑बार केवल मानव रूप में ही जन्म लेती है, जिससे जीवात्मा को निरंतर मानव जन्म ही मिलता रहेगा। इसलिए हर हिंदू यही सोचता है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए आराम से अगले किसी मानव जन्म में प्रयास करेंगे। मेरे प्रिय हिंदू मित्रों! उपरोक्त संदर्भ में जीवात्मा के बार‑बार जन्म लेने की बात कही गई है, लेकिन यह नहीं कहा गया कि जीवात्मा बार‑बार मानव जन्म लेगी। जीवात्मा, का पुनर्जन्म तो प्रायः पशु, पक्षी, कीट या कृमि के रूप में ही होता है। ऐसे जन्मों में जीवात्मा को आध्यात्मिक प्रयास करने का कोई भी अवसर नहीं मिलता। इसके अलावा, हिंदू धर्म में यह भी बहुत स्पष्ट रूप से कहा गया है कि मानव जन्म पुनः प्राप्त करना अत्यंत दुर्लभ है। इसका अर्थ यह है कि मानव जन्म पुनः प्राप्त करना लगभग असंभव है (जन्तूनां नरजन्म दुर्लभमिदम्…, मनुष्यत्वम्… दुर्लभम्…). “अत्यंत दुर्लभ” का अर्थ है “लगभग असंभव”। हिंदू यह सोचते हैं कि यदि वे मार्च की परीक्षा में असफल हो जाते हैं, तो वे सितंबर की परिक्षा में या फ़िर अगले मार्च की परीक्षा में फिर से बैठ जाएंगे, ऐसे ही बार-बार परीक्षा देते रहेंगे। पुनर्जन्म की यह गलत अवधारणा ही इस दुर्भाग्यपूर्ण सोच की ज़िम्मेदार है। शास्त्र ने ऐसा क्यों कहा कि मानव जन्म पुनः प्राप्त करना ‘अत्यंत दुर्लभ’ है, ऐसा क्यों नहीं कहा कि असंभव है? इसका कारण यह है कि यह पूरी तरह ‘असंभव’ नहीं है, क्योंकि भगवान के पास विशेष शक्ति है। वे किसी अत्यंत योग्य भक्त को मानव जन्म पुनः प्रदान कर सकते हैं। ऐसा विशेष अवसर अत्यंत दुर्लभ होता है और हम निश्चित रूप से उन अत्यंत दुर्लभ भक्तों की श्रेणी में नहीं आते हैं। इसलिए, मानव जन्म पुनः प्राप्त करना हमारे लिए लगभग असंभव है। तो, जब मनुष्य जन्म प्राप्त करना लगभग असंभव है तो उसकी आशा रखते हुए आध्यात्मिक प्रयास को अगले जन्म के लिए छोड़ने का खतरा हम क्यों उठाएंं?

यदि हम इस्लाम और ईसाई जैसे धर्मों को देखें, तो उनके शास्त्रों में, अत्यंत दुर्लभ होने के करण पुनर्जन्म का कोई उल्लेख ही नहीं है। वे कहते हैं कि किसी भी जीवात्मा के लिए मानव जन्म पुनः प्राप्त करना असंभव है। मनुष्य पुनर्जन्म न मानने के कारण उन धर्मों के अनुयायियों को बड़ा लाभ मिला है। वे इसी मानव जन्म में ही ईमानदारी से आध्यात्मिक प्रयास करने के लिए प्रेरित हुए हैं। वे बिना किसी उपेक्षा के आध्यात्मिक मार्ग के प्रति अत्यंत सावधान रहते हैं, और उन्होंने भगवान के प्रति गहरी श्रद्धा और विश्वास विकसित किया है।

हमें अपनी कमियों को स्वीकार करना चाहिए और अन्य धर्मों के सदगुणों का अनुसरण करना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें यह सोचकर निराश होना चाहिए कि हमारे धर्म में सिर्फ़ दोष ही दोष है और अन्य धर्मों मे केवल गुण। हमारे धर्म में भी कई गुण हैं और दूसरों के धर्मों में कई दोष। इसलिए, दूसरों को अहंकारी नहीं होना चाहिए और हमें हतोत्साहित नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार, दूसरों को भी अपनी कमियों को सुधारना चाहिए और हमारे गुणों अपनाना चाहिए। यदि वे अपने अहंकार पर विजय प्राप्त कर लें, तो उन्हें भी अत्यधिक लाभ होगा।

८) मैं हमारे धर्म के कुछ अन्य दोषों की ओर भी ध्यान ले जाना चाहता हूँ जो हमारे लिए लाभदायक है:

(क) कलियुग के प्रारंभ में हमारे हिंदू आचार्यों ने वेदों का पाठ अर्थात उनका उच्चारण बिना उसका अर्थ समझे ही करना शुरू किया। यदि कोई विज्ञान या इंजीनियरिंग का छात्र पुस्तक को बिना समझे केवल रटकर दोहराए, तो क्या उसे नौकरी के इंटरव्यू के लिए बुलाया जाएगा? वेद का अंध पाठ करने वाले को ‘वेद पाठक’ कहा जा सकता है (जो वेद को टेप रिकॉर्डर की तरह दोहराता है)। उसे ‘वेद पंडित’ (वेद का ज्ञाता) नहीं कहा जा सकता। प्राचीन काल में वेदों के अंध पाठ अर्थात रटने की अत्यधिक आवश्यकता थी क्योंकि उस समय मुद्रण अर्थात छपाई की कोई तकनीक उपलब्ध नहीं थी और वेदों को संरक्षित रखने का यही एकमात्र उपाय था। अब वेदों का पूरी तरह से मुद्रिकरण अर्थात छपाई का कार्य हो चुका है और उनकी लाखों प्रतियाँ विश्वभर में वितरित की जा चुकी हैं। इसलिए अब ऐसे अंध पाठ या रटने की कोई आवश्यकता नहीं है। टेप रिकॉर्डर की तरह बिना अर्थ समझे पाठ करने में समय नष्ट करने के बजाय, विद्यार्थी के लिए यह बेहतर है कि वह संस्कृत भाषा तथा व्याकरण, तर्कशास्त्र आदि सहायक शास्त्रों का अध्ययन करें। इससे विद्यार्थी वेद के अर्थ जान सकेंगे। ‘वेद’ शब्द का तो अर्थ ही स्वयं ‘ज्ञान’ है, न कि बिना अर्थ जाने केवल शब्द। पुरोहित छपी हुई पुस्तक को देखकर वेद का उच्चारण कर सकते हैं ताकि वह उनका शाब्दिक अर्थ और आंतरिक अर्थ अर्थात छिपे हुए अर्थ को विस्तार से समझा सकें। अन्य धर्मों में उनके धर्म ग्रंथों का अध्ययन इसी प्रकार किया जाता है और हर व्यक्ति अपने धर्म ग्रंथ को समझ पाता है क्योंकि उसे उनकी मातृभाषा में समझाया जाता है। न तो संस्कृत हमारी मातृभाषा है और न ही कोई सामान्य हिंदू संस्कृत भाषा जानता है। पुरोहितों ने या तो हमारे संस्कृत भाषा में रचे शास्त्रों को आम जनता की स्थानीय भाषा में समझाना चाहिए या प्रत्येक हिंदू को संस्कृत भाषा सीखनी चाहिए। कम से कम वेद-शास्त्रों का स्थानीय भाषाओं में तो सही रूप से अनुवाद किया जाना चाहिए। मुझे यह आखिरी विकल्प अधिक पसंद है क्योंकि अनुवादों के द्वारा हर व्यक्ति सीधे संस्कृत भाषा में उपलब्ध शास्त्र को स्वयं ही समझ सकेगा। पुरोहित पर निर्भर रहे तो पुरोहित अर्थ को गलत समझ सकता है या तो उसे तोड़‑मरोड़ भी सकता है। अनुवाद द्वारा शास्त्रों को अपने आप समझ पाने का अवसर अन्य धर्मों के अनुयायियों को भी है। 

(ख) वर्ण-व्यवस्था को सही आधार पर स्थापित किया जाना चाहिए। भगवान कृष्ण ने गीता में स्पष्ट रूप से कहा है कि वर्ण-व्यवस्था जीवात्मा के गुणों और कर्मों पर आधारित है, जन्म पर नहीं (गुणकर्मविभागशः…)।

(ग) उपनयन वह संस्कार है जिसमें बालक को जनेऊ (यज्ञोपवीत) पहनाकर गायत्री छंद में बद्ध एक वैदिक मंत्र का जाप करने की दीक्षा दी जाती है। इस मन्त्र का देवता स्पष्ट रूप से सविता बताया गया है। सविता का अर्थ है सृष्टिकर्ता या ब्रह्मदेव। (गायत्री छंदः, सविता देवता)। आधुनिक काल में की जाने वाली उपनयन की प्रक्रिया पूरी तरह गलत है। गायत्री का अर्थ है भगवान के द्वारा दी हुई सुरक्षा, जिसे भक्त भगवान की स्तुति में गाए मधुर गीत गाकर प्राप्त करता है। यहाँ तक कि यदि कोई सिनेमा गीत भगवान की ओर समर्पित कर दिया जाए, तो वह भी सर्वोच्च भक्ति गीत बन सकता है। यह गायत्री की वास्तविक प्रक्रिया, किसी भी धर्म, क्षेत्र, जाति या लिंग तक सीमित नहीं है। प्रत्येक जीवात्मा को इस संस्कार का अधिकार है। कोई भी किसी भी धर्म के भगवान की स्तुति अपनी मातृभाषा में कर सकता है। इस प्रकार गायत्री और उपनयन सार्वभौमिक हैं, जिन्हें ऋषि विश्वामित्र ने खोजा था। ‘विश्वामित्र’ शब्द का अर्थ ही है सबका मित्र।

(घ) इसी प्रकार हमारे पुरोहित कहते हैं कि ‘उपवास’ शब्द का अर्थ है भोजन न करना। वास्तव में, उपवास का अर्थ है आध्यात्मिक चर्चाओं, भजन इत्यादि के द्वारा भगवान के निकट रहना। भगवान की भक्ति में मन तल्लीन होने के कारण जब व्यक्ति भोजन करना स्वाभाविक रूप से भूल जाता है, तभी उसे उपवास कहा जाता है। अतः उपवास का अर्थ भोजन को जबरन त्यागना नहीं है। उसी प्रकार ‘जागरण’ का अर्थ नींद को जबरन त्यागना नहीं होता है। असली जागरण तो वह है जिसमें भगवान में लीन होने के कारण नींद स्वतः ही नहीं आती।

(ङ) जब से कलियुग प्रारंभ हुआ, अंध वेद पाठकों ने मूर्खतावश इन अज्ञानता से भरी प्रथाएँ को विकसित कर उन्हें जाति और लिंग की सीमाओं में बांध दिया, क्योंकि वे वेद-ज्ञान का अध्ययन, पूर्ण विश्लेषण के साथ करने में असमर्थ थे। यद्यपि वेद में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कोई भी अन्न नष्ट नहीं किया जाना चाहिए (अन्नं न परिचक्षीत…), उन्होंने सबसे मूल्यवान घी‑युक्त अन्न को भौतिक अग्नि में जलाना शुरू कर दिया। वास्तव में ऐसा अन्न गरीब लोगों को दान करना चाहिए जिससे उनके मानसिक और शारीरिक बल का विकास हो सके। यज्ञ का अर्थ है, वेद सम्मेलनों में भाग लेने आए सहभागियों को घी‑युक्त भोजन खिलाना। घी‑युक्त अन्न को ‘घी’ कहा जा सकता है, जैसे सेब बेचने वाले को ‘ओ सेब’ कहकर पुकारा जाता है (अजहत् लक्षणा या लक्ष्यार्थ)। अग्नि का पहला प्रकार है लकड़ियों से प्रज्वलित भौतिक अग्नि, जिसे भौतिकाग्नि या लौकिकाग्नि कहते हैं। दूसरा प्रकार है बिजली से प्रज्वलित भौतिक अग्नि, जिसे वैद्युताग्नि कहते हैं। भौतिकाग्नि या वैद्युताग्नि यज्ञ के केवल साधन हैं क्योंकि घी‑युक्त अन्न अर्थात भोजन, ऐसी अग्नि से पकाया जाता है। तीसरा प्रकार है भूखे व्यक्ति के पेट में विद्यमान भूख की अग्नि, जिसे देवताग्नि (दैवीय अग्नि) या वैश्वानराग्नि कहा जाता है।

गीता में कहा है कि भगवान ही वह वैश्वानराग्नि हैं जिसकी पूजा की जानी चाहिए। इस वैश्वानराग्नि के धारक व्यक्ति को लक्ष्यार्थ के आधार पर ‘वैश्वानराग्नि’ कहा जाता है। वेद में भूखे अतिथि को ही वैश्वानराग्नि कहा गया है (वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिः ब्राह्मणो गृहान्)। अतः इसका अर्थ यह है कि यज्ञ में भूखे अतिथि, जिसे वैश्वानराग्नि कहा गया है, उसकी सेवा घी‑युक्त भोजन खिलाकर की जानी चाहिए। हमारे अज्ञानी पुरोहितों ने वैश्वानराग्नि को भौतिक अग्नि समझकर, और घी‑युक्त भोजन को केवल घी समझकर, मूल्यवान घी को भौतिक अग्नि में डालकर जलाना शुरू किया, और आज तक कर रहे हैं!

ऋग्वेद के पहले ही सूक्त का पहला मंत्र अग्नि को घी का ग्रहणकर्ता भी और घी का प्रदाता भी कहता है। यह कैसे संभव है? पहले तो यह याद रखना चाहिए कि घी का अर्थ घी‑युक्त भोजन होता है। अब एक ही अग्नि इस घी युक्त अन्न को अर्पण करने वाली, अर्थात ‘होता’ भी और उसे ग्रहण करने वाली, अर्थात ‘हवनीय’ भी कैसे हो सकती है? यदि आप ‘अग्नि’ शब्द का अर्थ केवल जड़ भौतिक अग्नि ही लेते हैं, तो यह सही नहीं है, क्योंकि जड़ अग्नि केवल किसी जीवित प्राणी द्वारा अर्पण किए हुए घी को ग्रहण कर सकती है, लेकिन स्वयं घी को अर्पण नहीं कर सकती। इसलिए हमें ‘अग्नि’ शब्द का अर्थ एक जीवित भूखे व्यक्ति के रूप में लेना चाहिए, जो अपने हाथ से घी‑युक्त भोजन अपने मुख में डालता है और वह भोजन अंततः उसके पेट में विद्यमान भूख की अग्नि द्वारा ग्रहण किया जाता है। यदि ऋग्वेद के इस पहले मंत्र को सही रूप से समझा जाए, तो यज्ञ को भी सही रूप से समझा जा सकता है। चूँकि हमारे जीते जागते टेप रिकॉर्डर-पुरोहित इसे गलत समझ बैठे, सब कुछ बिगड़ गया।

(च) इन मूर्ख, अज्ञानी पुरोहितों ने जन्म के आधार पर निम्न जातियों में जन्में पुरुषों और सभी जातियों की स्त्रियों को उपनयन, गायत्री और यज्ञ संस्कार से वंचित कर दिया। वास्तव में, स्त्रियाँ ही भगवान की पूजा करते समय और व्रत रखते समय मधुर भक्ति गीत गाती हैं। स्त्रियाँ ही भोजन पकाती हैं और भूखे लोगों को खिलाती हैं। अतः वास्तविक उपनयन, गायत्री और यज्ञ तो स्त्रियों के साथ ही है, पुरुषों के साथ नहीं। पुरुषों ने स्त्रियों को इन संस्कारों से वंचित रखना चाहा मगर भगवान की दिव्य व्यवस्था के कारण ये पुरुष स्वयं ही इन संस्कारों के असली रूप से वंचित हो गए। ऐसे समाज के अंधे और स्वार्थी लोगों द्वारा बनाए हुए विभाजनों के कारण हिंदू धर्म अपनी एकता खो बैठा और बहुत कमजोर हो गया।

(छ्) पुरोहितों ने जनता को यह उपदेश देना चाहिए कि पाप को रद्द या समाप्त करना केवल एक ही मार्ग से संभव है। यह मार्ग है सुधार का, जिसके तीन चरण हैं:-

१. किए हुए पाप का बोध (Realization)

२. किए हुए पाप का पश्चात्ताप (Repentance)

३.भविष्य में उस पाप को न दोहराना (Non-repetition)

इनमें से तीसरा चरण सबसे मुख्य है और वही शाश्वत सुधार का प्रमाण भी है। केवल बोध और पश्चात्ताप से सुधार साबित नहीं होता है, जब तक कि न दोहराने का तीसरा चरण व्यक्ति अपने पूरे जीवन में लागू न कर ले। यह सुधार की प्रक्रिया पूर्ण होते ही भगवान उस विशिष्ट प्रकार के पाप से संबंधित सभी आने वाले दंडों को रद्द कर देते हैं। मान लीजिए कि एक व्यक्ति ने एक विशिष्ट प्रकार का पाप अनेक बार किया है। निःसन्देह, उसे हर एक बार किए हुए उस प्रकार के पाप के लिए दंड भोगना पड़ेगा। उन दण्डों में से जो कुछ दंड भोगना अभी बाकी है, वे सुधार के बाद रद्द किए जाएंगे। इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी प्रकार के पापों के आने वाले दंड रद्द किए जाएंगे। वे तभी रद्द किए जाएंगे जब उन अलग-अलग प्रकार के पाप करने की वृत्तियों में भी वह व्यक्ति उपरोक्त दिए हुए तीन चरणों के द्वारा सुधार लाए। यदि सभी प्रकार के पापों के दंड को रद्द कराना है, तो भविष्य में किसी भी प्रकार का पाप पुनः नहीं किया जाना चाहिए। इस एक मार्ग को छोड़कर पापों के दंड को रद्द कराने का कोई अन्य उपाय नहीं है। केवल पाप का बोध और पश्चात्ताप, बिना पाप की पुनरावृत्ति को रोके, पूर्णतः व्यर्थ है।

पुरोहितों ने लोगों को यह गलत जानकारी नहीं देनी चाहिए कि किसी भी पाप को भगवान की पूजा द्वारा रद्द किया जा सकता है। ऐसी पूजा न सिर्फ पापों के दंड को रद्द करने में असमर्थ होती है, बल्कि उसके पीछे स्वार्थी उद्देश्य होने के कारण उत्तम नहीं मानी जा सकती। यजमान पूजा केवल इसलिए करता है कि उसके पाप रद्द हो जाए और पुरोहित इसलिए पूजा कराता है कि वह पूजा के माध्यम से धन कमा सके!

(ज) चमत्कार भगवान द्वारा केवल नास्तिकों के लिए किए जाते हैं ताकि वे अकल्पनीय भगवान के अस्तित्व पर विश्वास कर सकें। चमत्कार ऐसी घटना होती है जिसका कारण या स्रोत किसी भी व्यक्ति की कल्पना से परे होता है। अतः चमत्कार को अकल्पनीय घटना भी कहा जा सकता है। चमत्कारिक घटना को नास्तिक भी अपनी इन्द्रियों द्वारा जान सकते हैं मगर उन्हें यह मानना पड़ता है कि उस चमत्कार का कारण तो कोई ‘अकल्पनीय कारण’ ही हो सकता है। यह अकल्पनीय कारण ही अकल्पनीय परब्रह्म है। अतः चमत्कार के अनुभव से नास्तिकों को भी अकल्पनीय परब्रह्म के अस्तित्व को मानना पड़ता है। यही चमत्कारों का मुख्य उपयोग है। आस्तिकों को चमत्कारों की आवश्यकता नहीं होती। आस्तिकों ने तो आध्यात्मिक मार्ग का पालन करना चाहिए। आध्यात्मिक मार्ग के तीन चरण होते हैं:- (१) ज्ञान-योग (आध्यात्मिक ज्ञान का अध्ययन), (२) भक्ति-योग (भगवान के प्रति मानसिक भक्ति विकसित करना) और अंततः (३) कर्म-योग (मानसिक भक्ति का व्यवहार में प्रमाण देना)। कर्मयोग के दो घटक होते हैं। दोनों ही वास्तविक व्यवहार में किए हुए कर्म से जुड़े होते हैं। ये दो घटक हैं, भगवान की सेवा (कर्म-संन्यास) और परिश्रम से कमाए हुए कर्मफल अर्थात धन का दक्षिणा के रूप में भगवान को किया हुआ निःस्वार्थ त्याग (कर्मफल त्याग)।

अध्यात्म मार्ग का अंतिम चरण, अर्थात कर्म योग ही दिव्य फल देता है, लेकिन पहले दो चरण भी आवश्यक हैं। कर्म-योग आम के पौधे के समान है, जो आम का फल देता है। ज्ञान-योग पानी है, जिसके बिना पौधा मर जाता है। भक्ति-योग खाद है, जिसके बिना पौधा वृक्ष बनकर फल नहीं दे सकता।

झ) भगवान श्रीकृष्ण के मक्खन चुराने और विवाहित गोपिकाओं के साथ नृत्य करने को अज्ञानी विद्वान केवल ‘लीला’ मानते हैं। वास्तव में, ये गोपिकाएँ पिछले करोड़ों जन्मों में महान तपस्वी ऋषि थे। पिछले करोड़ों जन्मों से वे ज्ञान की साधना में लीन थे, जिसे वेदों में उत्तम तप कहा गया है। उनका उद्देश्य सभी सांसारिक बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर भगवान को पाना था। संसार में तीन बंधन सबसे मजबूत बंधन होते हैं – धन का बंधन, संतान का बंधन और पति‑पत्नी का बंधन। परंतु इन तीन बंधनों को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है:-

१) पहला वर्ग है, धन और संतान के बंधन। इन दोनों को साथ में जोड़ने का कारण यह है कि ये हमेशा जुड़े हुए ही पाए जाते हैं। कमाया हुआ धन संतान के लिए ही तो रखा जाता है।

२) दूसरा वर्ग है पति‑पत्नी का बंधन।

अतः भगवान इन दो वर्ग के बंधनों की परीक्षाएं लेते हैं। धन और संतान बंधन की परीक्षा भगवान कृष्ण ने मक्खन चुराकर ली, जो गोपिकाओं ने अपने बच्चों के लिए छुपाकर रखा था। आश्चर्य की बात तो यह थी कि अधिकांश गोपिकाएँ माँ यशोदा से शिकायत करने गईं, यह जानते हुए भी कि कृष्ण स्वयं भगवान हैं!! (नारद मुनि ने भी इस बात का उल्लेख अपने ‘भक्ति सूत्र’ में किया है कि गोपिकाएं यह भली-भांति जानती थीं कि कृष्ण भगवान हैं, “तत्रापि न माहात्म्य ज्ञान विस्मृत्यपवादः”)।

पति‑पत्नी के बंधन की परीक्षा भगवान कृष्ण ने विवाहित गोपिकाओं के साथ नृत्य करके ली। इस परीक्षा का उद्देश्य यह देखना था कि उनका प्रेम अपने पतियों के प्रति ज्यादा मजबूत है या भगवान के प्रति। धन, संतान और पति, इन तीनों बंधनों की परीक्षा भगवान के साथ के बंधन की तुलना में की गई। अतः, भगवान श्रीकृष्ण ने तीन सबसे मज़बूत सांसारिक बंधनों की परीक्षा इस प्रकार से ली और केवल १२ गोपिकाएँ ही संयुक्त बंधन अर्थात धन और संतान के बंधन की परीक्षा में सफल हुईं। पति‑पत्नी के बंधन की परीक्षा में सभी गोपिकाएं सफल रहीं। इस प्रकार, केवल १२ गोपिकाएँ ही ‘गोलोक’ पहुँच सकीं, जो भगवान के सर्वोच्च लोक ब्रह्मलोक से भी ऊँचा लाेक है। इसलिए, श्रीमद भागवत पुराण अध्यात्म के विद्वान जनों के ज्ञान (विद्या) की परीक्षा है (विद्यावतां भागवते परीक्षा)। भागवत पुराण कोई चोरी और अवैध संबंधों जैसे पाप कर्मों की प्रशंसा नहीं करता है।

ञ) हर त्योहार का मुख्य उद्देश्य भगवान के प्रति भक्ति को बढ़ाना होता है। त्योहारों पर साधारण भोजन करना चाहिए, ताकि मन और शरीर सक्रिय रहें और आलस्य न आए। तभी आप भक्ति संबंधित कार्यों में पूरी तरह से भाग ले सकेंगे। प्रारंभ में सिर्फ़ त्यौहारों के समय पर आप भक्ति करते हैं। धीरे‑धीरे आपने भक्ति को बढ़ाकर प्रतिदिन भक्ति करनी चाहिए। विवाह जैसे कार्यक्रमों में विशेष भोजन रिश्तेदारों और मित्रों को नहीं, बल्कि भिखारियों को देना चाहिए, क्योंकि उनके पास पर्याप्त भोजन नहीं होता है। ऐसा करने से भगवान बहुत प्रसन्न होंगे। आपने सबसे गरीब भिखारियों को भोजन, आश्रय, वस्त्र और दवा देकर उनका जीवन बचाना चाहिए। भगवान के नाम पर उनके लिए भिखारी‑गृह बनाए जाने चाहिए। जब अत्यंत गरीब श्रेणी वाले भिखारियों की सेवा करके उनका जीवन सुरक्षित हो जाए, तभी अगली श्रेणियों के गरीबों की अर्थात मध्यम श्रेणी के और सामान्य श्रेणी के गरीबों की मदद करनी चाहिए। ऐसा करने से भगवान अत्यंत प्रसन्न होते हैं। यह जिम्मेदारी समाज के अमीर व्यक्तियों और मंदिरों के ट्रस्टों को उठानी चाहिए। यदि कोई भी व्यक्ति भूख से मर जाए तो यह मानवता के लिए शर्म की बात है। प्राणों की रक्षा करना यह सबसे आवश्यक सेवा है और भगवान की दृष्टि में यह सर्वोच्च प्राथमिकता है।

ट) भगवान से कुछ भी माँगना नहीं चाहिए क्योंकि भगवान सर्वज्ञ हैं। भगवान को पूरी तरह से पता है कि आपको क्या देना है, क्या नहीं देना है, कब देना है और कितना देना है। यदि आप कुछ भी माँगते हैं, तो आप उनकी सर्वज्ञता का अपमान करते हैं। यदि भगवान आपकी आवश्यकता को ही जानने में असमर्थ हैं, तो क्या वे आपकी आवश्यकता को पूरा करने में सर्वसमर्थ हो सकते हैं? भगवान की सर्वज्ञता और सर्वसमर्थता हमेशा परस्पर जुड़ी होती है। भगवान की भक्ति का स्वरूप केवल उनके दिव्य व्यक्तित्व के प्रति निःस्वार्थ आकर्षण होना चाहिए। भगवान की भक्ति, पूजा आदि का उद्देश्य, सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति कभी नहीं होना चाहिए। भगवान की सर्वशक्तिमत्ता का उपयोग सांसारिक लाभ के लिए नहीं करना चाहिए। कुछ लोग अपनी चापलूसी की कला को भक्ति का नाम देते हैं। वे केवल अपना स्वार्थ पाने के लिए भगवान की प्रार्थना करते हैं;  मीठे मीठे गीत और भजन गाकर भगवान को रिझाने की कोशिश करते हैं।

इसका अर्थ यह है कि वे मन की भावनाएं और शब्दों के अलावा भगवान को कुछ भी वास्तविक रूप से अर्पित नहीं करते हैं। परंतु इसके बदले वे भगवान से धन, सुरक्षा आदि जैसी वास्तविक चीजों की अपेक्षा अवश्य रखते हैं। यह तो अवास्तविक त्याग के बदले में वास्तविक लाभ पाने की केवल चालबाजी है। इस प्रकार की भक्ति ‘वेश्या भक्ति’ कहलाती है। कुछ लोग भगवान की थोड़ी से वास्तविक सेवा (कर्म-संन्यास) करते हैं या उन्हें  अपने कमाए हुए कुछ धन की दक्षिणा (कर्मफल-त्याग) देते हैं। उनका त्याग तो वास्तविक है। परन्तु, इस वास्तविक त्याग के बदले में वे भगवान से कुछ वास्तविक सांसारिक लाभ की आशा भी रखते हैं। ऐसी भक्ति को ‘वैश्य-भक्ति’ कहते है।

भक्ति का सर्वोत्तम रूप है कर्म-योग। इसमें वास्तविक सेवा (कर्म-संन्यास) और कमाए हुए धन का दक्षिणा के रूप में त्याग (कर्मफल-त्याग) होता है। मगर इसमें भगवान से किसी प्रतिफल की अपेक्षा नहीं होनी चाहिए। यह सेवा और त्याग, भगवान के प्रति जन्में स्वाभाविक प्रेम पर ही आधारित होना चाहिए। माता पिता अपने बच्चों के प्रति सच्चे प्रेम के कारण उनकी बचपन से सेवा करते हैं। वे अपनी संपूर्ण संपत्ति अपने बच्चों के ही नाम कर देते हैं, भले ही उनके बच्चे बड़े होकर उनका तिरस्कार ही क्यों न करें। इससे सिद्ध होता है कि उनका अपने बच्चों के प्रति प्रेम सच्चा (वास्तविक) भी है और प्रतिफल की आशा से रहित भी। ठीक उसी प्रकार हमारी भगवान के प्रति भक्ति भी प्रतिफल आशा से रहित और वास्तविक त्याग से प्रमाणित होनी चाहिए। ऐसी सच्ची भक्ति को अपत्य-भक्ति या पुत्र-भक्ति कहते हैं।

भक्ति की अकल्पनीय और चरम सीमा उन्माद भक्ति है। किसी राजनेता या अभिनेता के चाहने वालों में कोई एक अंधप्रेमी होता है। वह उस नेता के हर कार्यक्रम में शामिल होता है और सेवा करता है, अपनी जेब से पैसे भी खर्च करता है। उसे अपने चहेते नेता से कोई प्रतिफल पाने की आशा नहीं रहती है बल्कि वह भली-भांति जानता है कि वह नेता तो उसका नाम तक नहीं जानता है! फिर भी वह निरंतर उन्मत्त प्रेम में अपने चहेते नेता के लिए त्याग करते जाता है। अंत में जब नेता का देहांत होता है तो यह अंधप्रेमी अत्यंत शोक के कारण अपने जीवन का भी अंत कर लेता है। उस नेता के परिवार वालों को भी उस नेता से इतना प्रेम नहीं होता है। वे तो  नेता के मरने के बाद तुरंत ही उसकी संपत्ति में से अपने हिस्से के लिए एक दूसरे से लड़ने लगते हैं! सर्वोच्च भक्ति वह है जो उस नेता के उन्मत्त प्रेमी की तरह हो। इसी को उन्माद भक्ति कहते हैं। 

किसी भी भक्त को चाहिए कि वह अपनी भक्ति का स्तर कम से कम ‘अपत्य-भक्ति’ तक उठाए। स्वयं को माता‑पिता की जगह पर रखकर भगवान दत्त को संतान (अपत्य) की जगह पर रखे। लेकिन भक्त बहुत चालाक होते हैं। वे इसे उलट देते हैं। वे भगवान दत्त को माता‑पिता की जगह पर रखते हैं, जिससे कि उन्हें भगवान से एकतरफा लाभ प्राप्त होता रहे, भले ही उनमें दोष ही क्यों न भरे हो।

ठ) भगवान दत्त के आदेशानुसार मैंने आध्यात्मिक ज्ञान रूपी भोजन की तैयारी पूरी कर ली है, जिसे विस्तारपूर्वक हमारे आध्यात्मिक वेबसाइट – www.universal-spirituality.org के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। अब, भगवान दत्त आप सभी को आदेश देते हैं कि इस भोजन को पूरे विश्व में वितरित करें ताकि हिंदू धर्म के उप-धर्म और उसके बाद विश्व के सभी धर्म एकजुट होकर सदा के लिए विश्व शांति स्थापित कर सकें। यदि आप यह कार्य करते हैं, तो मैं आप सभी से निश्चित रूप से कहता हूँ कि आपको भगवान दत्त की शाश्वत कृपा प्राप्त होगी।

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